पेन्सन वितरण कार्यालय धरानमा ६६ औ गणतन्त्र दिवस भव्य रुपमा मनाइयो

धरान/संसारलाई चकित पार्दै नेपालको अत्यन्तै निकटको छिमेकी मुलुक भारतले आफ्नो ६६ आौ गणतन्त्र दिवस गत सोमबार भव्यतापूर्वक मनाएको छ । देशमामात्र हैन विदेशमा रहेका आफ्ना कुटनीतिक नियोगहरुमा समेत गणतन्त्र दिवसका अवसरमा रौनकता देखिन्यो । नेपालस्थित रहेको कुटनीतिक नियोगहरु भारतीय राजदुतावास काठमाण्डौ, पेन्सन वितरण कार्यालय धरान, क्याम्प अफिस, विराटनगर, महावाणिज्य दुतको कार्यालय वीरगञ्ज, पेन्सन वितरण कार्यालय
पोखरामा समेत ६६ औं गणतन्त्र दिवस भव्यरुपमा मनाइएको थियो ।
पेन्सन वितरण कार्यालय धरानमा आयोजित कार्यक्रममा स्थानीय उद्योगी, व्यवसायी, सामाजिक अभियन्ताहरु, पूर्व क्षेत्रीय प्रहरी प्रमुख नवराज सिलवाल, जिल्ला प्रहरी प्रमुख मसउद्धिन खाा, पूर्वाञ्चल क्षेत्रीय राष्ट्रिय अनुसन्धान कार्यालयका प्रमुख महेन्द्र भट्टराई, भारतीय भूतपूर्व सैनिकहरु, बीपी कोइराला स्वास्थ्य विज्ञान प्रतिष्ठानका पदाधिकारीहरु लगायतको समुपस्थितिमारहेको थियो ।
सो अवसरमा पेन्सन वितरण कार्यालय धरानमा अफिस इन्चार्ज मेजर सतिश पाटिललले भारतका राष्ट्रपति प्रवण मुखर्जिले राष्ट्रका नाममा जारी गर्नुभएको सन्देश पढेर सुनाउनुभएको थियो । सन्देशको पूर्ण विवरण हिन्दीमा :
मेरा प्यारा देशबासियो, छियासठवें गणतन्त्र दिवसकी पूव सन्ध्या पर, मै भारत और विदेशोामो बसे आप सभी को हार्दिक बधाई देता हूा । मै, हमारी सशस्त्र सेनाओं, अर्ध–सैनिक बलों तथा आन्तरिक सुरक्षा बलों के सदस्यों को अपनी विशेष बधाई देता हूं ।
छब्बीस जनवरीका दिन हमारे देशकी स्मृतिमें एक चिरस्थाई स्थान
रखता है क्योेंकि यही वह दिन है जब आधुनिक भारत का जन्म हुआ था । महात्मा गांधी के नैतिक तथा राजनीतिक नेतृत्व के अधीन राष्ट्रिय कााग्रेस ने अंग्रेज राज से पूरी स्वतन्त्रताकी माग करेत हुए दिसंवर, १९२९ मे पूर्ण स्वराज का संकल्प पारित किया था । २६ जनवरी, १९३० को, गान्धी जी ने पूरे देश में स्वतन्त्रता दिवस के रुप में राष्ट्रव्यापी समारोहोंका आयोजना किया था । उसी दिन से, देश तब तक हर बर्ष इस दिन स्वतन्त्रता संघर्ष को जारी राखने की शपथ लेता
रहा जब तक हमने इसे प्राप्त नही कर लिया ।
ठीक बीस बर्ष वाद, १९५० मे, हमने आधुनिकता के अपने घोषणापत्र, संविधान को अंगीकार किया । यह विडंबना थी कि गांधी जी दो बर्ष पूर्व शहीद हो चुके थे परंतु आधुनिक विश्व के सामने भारत को आदर्श बनाने वाले संविधान के ढांचे की रचना उनके ही दर्शन पर की गई थी । इसका सार चार सिद्धांतो पर आधारित है : लोकतंत्र, धर्म की स्वतन्त्रता, लैंगिक समानता, तथा
गरीबी के जाल में फंसे लोगों का आर्थिक उन्नति । इन्हें संवैधानिक दायित्व बना दिया गया था । देश के शासकों के लिए गांधी जी का मंत्र सरल और शक्तिशाली था, “जब भी आप किसी शंका में हों……….तब उस सबसे गरीब और सबसे निर्बल व्यक्ति का चेहरा याद करें जिसे आपने देखा हो और फिर खुद से पुछें… क्या इससे भूखे और आधात्मिक क्षुधा से पीडित लाखों लोगों के लिए स्वराज आएगा ।” समावेशी विकास के माधयम से गरीबी मिटाने का हमरा संकल्प उस दिशा मे एक कदम होना चाहिए ।
प्यारे देशबासियो, पिछल्ला बर्ष कई तरह से विशिष्ट रहा है । खासकर इसलिए, कि तीन दशकों के वाद जनता ने स्थाई सरकार के लिए, एक अकेले दल को बहुमत देते हुए, सत्ता में लाने के लिए मतदान किया है और इस प्रक्रिया में देश के शासन को गठबंधन की राजनीति की मजबूरियों से मुक्त किया है । इन चुनावों के परिणमों ने चुनी हुई सरकार को, नीतियों के निर्माण तथा इन नीतियो के कार्यान्वयन के लिए कानून बनाकर जनता के प्रति अपनी वचनबद्धता को पूरा करने का जनादेश दिया है । मतदाता ने अपना कार्य पूरा कर दिया है, अब य चुने हुए लोगों का दायित्व है कि व इस भरोसे का सम्मान करें । यह मत एक स्वच्छ, कुशल, कारगर, लैंगिक संवेदनायुक्त, पारदर्शी, जवावदेह तथा नागरिक अनुकूल शासन के लिए था ।
प्यारे देशवासियो,
एक सक्रिय विद्यायिका के बिना शासन संभव नही है । विधायिका जनता की इच्छा को प्रतिबिंवित करती है । यह ऐसा मंच है जहाा शिष्टतापूर्ण संवाद का उपयोग करते हुए, प्रगतिशील कानून के द्वारा जनता की अकांक्षाओं को साकार करने के लिए सुपुर्दगी–तंत्र की रचना की जानी चाहिए । इसके लिए भागीदारों के बीच मतभेदों को दूर करने तथा बनाए जाने वाले कानुनों पर आम सहमति लाने की जरुरत होती है । बिना चर्चा कानून बनाने से संसद की कानून निर्माण की भूमिका को धक्का पहुंचता है । इससे, जनता द्वारा व्यक्त विश्वास टूटता है । यह न तो लोकतंत्र के लिए अच्छा है और न ही इन कानुनों से संबंधित नीतियों के लिए अच्छा है ।
प्यारो देशवासियो,
पंडित जवाहरलाल नेहरु,
सरदार पटेल, सुभापा चंद्र बोस, भगत सिंह, रवीन्द्रनाथ टैगोर, सुब्रहाण्य
भारतीय और अन्य बहुत से लोगों के व्यवसाय तथा नजरिए भले ही अलग–अलग रहे हों, परंतु उन सभी ने केवल राष्ट्र भक्ति की ही भाषा बोली, हम अपनी आजादी के लिए राष्ट्रियता के इन महान योद्धाअहों के ऋणी हैं । हम उन भुले–विसरे वीरों को भी नमन करते है जिन्होंने भारत माता की आजादी के लिए अपनी कुर्बानी दी । परंतु मुझे यह देखकर दु:ख होता है कि जब महिलाओं की हिफाजत की बात होती है तब उसके अपने बच्चोंद्वारा ही भारत माता का सम्मान नहीं किया जाता । बलात्कार, हत्या, सडकों पर छेडछाड, अपहरण तथा दहेज हत्याओं जैसे अत्याचारों ने महिलाओं के मन में अपने घरों में भी भय पैदा कर दिया है । रवीन्द्रनाथ टैगोर महिलाओं को न केवल घर मे प्रकाश कने वाली देवियां मनते थे
वरन् उन्हें स्वयं आत्मा का प्रकाश मानते थे । माता–पिता, शिक्षकों और नेताओं के रुप में, हमसे कहां चूक हो गई है कि हमारे बच्चे सभ्य व्यवहार तथा महिलों के प्रति सम्मान के सिद्धांतो को भूल गए है । हमने वहुत से कानून बनाए हैं, परंतु जैसा कि बैजामिन फ्रैंकलिन ने एक बार कहा था, “न्याय का उद्देश्य तब तक पूर्ण नहीं होगा जब तक कि वे लोग भी उतने ही क्षुब्ध नहीं महसूस करेत जो भुक्तभोगी नहीं है जितना कि वे, जो भुक्तभोगी है ।” हरएक भरतीय को किसी भी प्रकार की हिंसा से महिलाओं कि हिफाजत करने की शपथ लेनी चाहिए । केवल ऐसा ही देश वैश्विक शक्ति बन सकता है जो अपनी महिलाओं का सम्मन करे तथा उन्हें सशक्त बनाए ।
प्यारो देशवासियो,
भारतीय संविधान लोकतंत्र की पवित्र पुस्तक है । यह ऐसे भारत के सामाजिक–आर्थिक बदलाव का पथप्रदर्शक है, जिसे प्राचीन काल से ही बहुलता का सम्मान किया है, सहनशीलताका पक्ष लिया है तथा विभिन्न समुदायों के बीच सद्भाव को बढावा दिया है, । परंतु इन मूल्यां की हिफाजत अत्याधिक सावधानी और मुस्तैदी दिया है परंतु इन मूल्यों की हिफाजत अत्याधिक सावधानी और मुस्तैदी से करने की जरुरत है । लोकतंत्र मे निहित स्वतंत्रता कभी कभी उन्मादपूर्ण प्रतिष्पर्धा के रुप में एक ऐसा नया कष्टप्रद परिणाम सामने ले आती है जो हमारी परंपरागत प्रकृति के विरुद्ध है । वाणी की हिंसा चोट पहुचाती है ओर लोगों के दिलों को घायल करती है । गांधी जी ने कहा था कि धर्म एकता की ताकत है, हम इसे टकराव का कारण नहीं बना सकते ।
भारतकी सौम्य शक्ति के बारे में बहुत कुद्ध कहा जाता है । परंतु इस
तरह के अंतर्राष्ट्रिय परिवेश में, जहां बहुत से देश धर्म आधारित हिंसा के दलदल मे फंसते जा रहे है, भारत की सौम्य शक्ति का सबसे शक्तिबाली
उदाहरण धर्म एव. राज व्यववस्था के बीच संवंधो की हमारी परिभाषा में निहित है । हमने सदैव धार्मिक समानता पर अपना भरोसा जाताया है, जहां हर धर्म कानून के सामने बराबर है तथा प्रत्येक संस्कृति दूसरे में मिलकर एक
सकारात्मक गतिशीलता की रचना
करीत है । भारत की प्रजा हमे सिखाती है : एकता ताकत है, प्रभुता कमजोरी
है ।
प्यारे देशवासियो,
विभिन्न देशों के बीच टकराव ने सीमाओ को खूनी हदों मे बदल दिया है तथा आंकवादको बुराई का उद्योग बना दिया है । आतंकवाद तथा हिंसा
हमारी सीमाओं से घुसपैठ कर रहा
हैं । यद्यपि शान्ति, अहिंसा तथा अच्छे पडोसी की भावना हमारी विदेश नीति के बुनियादी तत्व होने चाहिए , परंतु हम ऐसे शत्रुओं की ओर से गाफिल
रहने का जोखिम नहीं उठा सकते जो समृद्ध और समतापूर्ण भारत की ओर हमारी प्रगति में बाधा पहुाचाने के लिए किसी भी सीमा तक जा सकते है । हमारे पास, अपनी जनता के विरुद्ध लडाइ के सूत्रधारो को हराने के लिए ताकत, विश्वास तथा दृढ निश्चय मौजूद है । सीमा रेखा पर युद्ध विरामका बार बार उल्लंघन तथा आतंकवादी आक्रमणों का कारगर कूटनीति तथा अभेद्य सुरक्षा प्रणाली कि माध्यम से समेकित जाब दिया जाना चाहिए । विश्व को आतंकवाद के इस अभिशाप से लड्ने में भारत का साथ देना चाहिए ।
प्यारे देशवासियो,
आर्थिक प्रगति लोकतंत्र की
परीक्षा भी है । बर्ष २०१५ उम्मीदों का बर्ष है । आर्थिक संकेतक बहुत आशाजनक है । बाह्य सेक्टर की मजुबूती, राजकोषीय सुदृढीकरण की दिशा में प्रगति, कीमतों के स्तर में कमी, विनिर्माण क्षेत्र में वापसी के शुरुआती संकेत तथा पिछले बर्ष कृषि उत्पादन में कीर्तिमान, हमारी अर्थव्यवस्था के लिए अच्चा संकेत है । २०१४–१५ की पहिली दिनों तिमाहियों मे, पााच प्रतिशत से अधिक की विकास दर की प्राप्ति, ७–८ प्रतिशत की उच्च विकास दर की दिशा में शुरुआती बदलाव के स्वस्थ संकेत हैं ।
किसी भी समाज की सफलता को, इसके मूल्यों, संस्थाओं तथा शासन के उपादानों के बने रहने तथा उनके मजबूत होर्ने, दोनों से मापा जाता है । हमारी राष्ट्रिय गाथा को इसके अतीत के सिंद्धाांतो और आधुनिक उपलब्धियों से आकार मिला है तथा यह आज अपनी प्रच्छन्न शक्ति को जाग्रह कर भविष्य को अपना बनाने के लिए तत्पर है ।
प्यारे देशवासियो,
हमारी राष्ट्रिय महात्वकांक्षा,
भारतीय जनता के जीवन स्तर को तेजी से ऊाचा उठाना तथा ज्ञान, देशभक्ति, करुणा, इमानदारी तथा कर्तव्य बोध से संपन्न पीढियो को तयार करना है । थाामस जैफरसन ने कहाा था, सारी जनता को शिक्षित तथा सूचना संपन्न बनाएं….केवल वे ही हमारी आजादी की रक्षा के लिए हमारा पक्का भरोसा है ।” हमें अपनी शैक्षिक संस्थाओं में सर्वोच्च गुणवत्ता के लिए प्रयास करने चाहिये ताकि हम निकट भविष्य में २१ वी सददी के ज्ञान क्षेत्र के अग्रणियों में अपना स्थान बना सकसकें । मै, विशेषकर, यह आग्रह कराना चाहूंगा कि हम पुस्तकों और पढ्ने की संस्कृति पर विशेष जोर दें, जो ज्ञान को कक्षाओं से आगे ले जाती है तथा कल्पनाशीलता कों तात्कालिकता और उपयोगितावाद के दबाब से अजाद करती है । हमें, अपास में एक दूसरे से जुडी हुई असंख्य विचारधारो से सम्पन्न सृजनाात्मक देश बनना चाहिए । हमारे युवा ओं को एसे ब्रहंड का, प्रोद्योगिकी तथा संचार मे पारंगता की दिशा मे नेतृत्व करना चाहिए, जहां आकास
सीमारहित पुस्तकालय बन जुका है तथा आपसी हथेली मे मौजूद कम्प्युटर में, महत्वपूर्ण अवसर आपकी प्रतीक्षा कर
रहे हैं । २१ वीं सदी भारत की मुट्ठी में है ।
प्यारे देशवासियो,
यदि हम हानिकारक आतदों और सामाजिक बुराइयों से खुद को निरंतर स्वच्छ करने की अपनी योग्यता का उपयोग नहीं करते तो भविष्य हमारे सामने मौजूद होते हुए भी हमारी पकड से दूर होगा । पिछली सदी के दौरान, इनमें से बहुत सी समाप्त हो चुकी हैं, कुछ निष्प्रभावी हो चुकी हैं परंतु बहुत सी अभी मौजूद
हैं । हम, इस बर्ष दक्षिण अफ्रिका से गांधी जी की वापसी की सदी मना रहे हैं । हम कभी भी महात्मा जी से सीख लेना नहीं छोडेंगे । १९१५ में उन्होंने जो सबसे पहला कार्य किया था वह था अपनी आंखें खुली रखना तथा अपना मुंह बंद
रखना । इस उदाहरण को अपनाना अच्छा होगा । जबकि हम, १९१५ की बात कर रहे हैं, जो कि उचित ही है, तब हमे संभवत : १९०१ मे, जिस बर्ष वह अपनी पहली छुट्टी में घर लौटे थे, गांधी जी ने जो कार्य किया था उस पर एक नजर डालनी चाहिए । कंग्रेस का बार्षिक अधिवेशन उस बर्ष कलकत्ता में आयोजित हुआ था जो उस समय ब्रिटिश भारत की
राजधानी था । वह एक बैठक के लिए
रिपोन काांलेज गए थे । उन्होंने देखा कि बैठक में भाग लेने वाले लोगो ने सारे स्थान को गंदा कर दिया है । यह देखकर स्तब्ध हुए गांधी जी ने सफाइकर्मी के आने का इंतजार नहीा किया । उन्हा्रेने झाडु उठाई तथा उस स्थान की सफाई कर डाली । १९०१ मे उनको उदाहरण का किसी नै अनुकरण नहीं किया था । आइए, एक सौ चौदह बर्ष बाद हम उनके उदाहरण का अनुकरण करें तथा एक महान पिता के सुयोग्य बच्चे बनें ।
कार्यक्रमको सुभारम्भ मेजर पाटिलले झण्डोत्तोलन र राष्ट्रियगानबाट गर्नुभएको थियो । पेन्सन वितरण कार्यालयको हातामा रहेको युद्धमा शहीद भएका गोरखा सैनिकको स्मरणमा बनाइएको सहीद स्मारकमा माल्यार्पवण र सलामी अर्पण गरिएको थियो । अन्तमा टक अफ
वारबाट उपस्थिति सबैलाई मनोरञ्जना प्रदान गरिएको थियो । टक अफ वारमा भारतीय भूतपूर्व सैनिकहरुको ८ वटा टिम यसपटक सहभागी भएका थिए । जसमा इटहरी भारतीय भूतपूर्व सैनिक संघ पहिलो र हाासापोसा भूतपूर्व सैनिक संघले दोस्रो भएको थियो । विजता र उपविजेता दुवैलाई मेजर शतिस पाटिल र क्षेत्रीय प्रहरी प्रमुख एवम् डिआइजी नवराज शिलवालले पुरस्कार वितरण गर्नुभएको थियो ।

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